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बाबा की नगरी में गणपति बप्पा मोरया की गूंज

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पंण्डालों में हुए विराजमान हुए गजानन

वाराणसी। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में शुक्रवार को गणपति बप्पा मोरया हर— हर महादेव की गूंज फिजाओं में रही। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी गणेश चतुर्थी पर विघ्नहर्ता गणेश की नयनाभिराम प्रतिमाओं के साथ रिद्धि-सिद्धि की प्रतिमाओं को सुबह आकर्षक विद्वुत लतरो से सजे धजे पंडालों में स्थापित कर साविधि वैदिक मंत्रोच्चार के बीच प्राण -प्रतिष्ठा ब्राम्हणों और बटुकों ने की। इसी के साथ गणेशोत्सव कहीं पांच दिवसीय तो कहीं सात दिवसीय पूजनोत्सव पण्डालो मेंं शुरू हो गया। गणेश पूजनोत्सव के क्रम में आस भैरो स्थित अग्रवाल भवन में काशी मराठा उत्सव समिति की ओर से लाल बाग के राजा की अनुकृति की प्रतिमा वैदिक मंत्रोच्चार के बीच स्थापित हुयी।

रत्नों से जड़ित बप्पा की मुर्ति देखने और दर्शन के लिए वहां सुबह से ही भीड़ जुटी रही। इसी तरह गणेश दीक्षित लेन गणेश भवन में सुबह आठ बजे भगवान की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा की गयी। इस दौरान चारों वेदों की शाखाओं के मंत्रोच्चार के साथ वसंत पूजा भी हुआ। इसी तरह अगस्त्यकुंडा स्थित शारदा भवन में दोपहर में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित हुयी। रामतारका आंध्रा आश्रम, सांगवेद विद्यालय रामघाट, सार्वजनिक श्रीणेशोत्सव, सिद्धि विनायक मंदिर गढ़वासी टोला,काशी विश्वनाथ गणपति महोत्सव काशी विद्या मंदिर (गायघाट) में सुबह 10 बजे प्राण प्रतिष्ठा हुयी।

शाम छह बजे सप्ताहव्यापी गणेशोत्सव का उद्घाटन सतुआ बाबा आश्रम के महामंडलेश्वर संतोष दास करेंगे। इसके अलावा शहर और जिले के अन्य स्थानों पर भी भगवान गणेश प्रतिमाओं की प्रतिष्ठापना सुबह 10 बजे तक कर वैदिक मंत्रोच्चार के बाद की गयी। प्राण प्रतिष्ठा के बाद पंण्डालो में प्रणम्य शिरसा देवं गौरी पुत्रम विनायकम भक्तावासं स्मरैन्नित्य मायुष्कामार्थ सिद्धये गणपति वंदना के बाद रंगोली, अल्पनाओं, मेहंदी सजाओ प्रतियोगिताओं की भी धूम रही।

सोनारपुरा में सजी भगवान चिंतामणि गणेश की जन्मोत्सव झांकी

गणेश चतुर्थी पर ही सोनारपुरा स्थित श्री चिंतामणि गणेश मंदिर में भगवान के जन्मोत्सव की भव्य झांकी के साथ हरियाली श्रृंगार एवं बर्फ विहार झांकी भी सजी। मंदिर में सुबह आठ बजे भगवान गणपति विग्रह की विशेष अर्चना की गयी। इसके बाद हरियाली श्रृंगार और बर्फ विहार झांकी श्रृंगार कर पूरे परिसर को बर्फ की 101 सिल्लियों रंग-बिरंगे फूलों व कामिनी व अशोक की पत्ती से सजाया गया। श्रृंगार में उन्हें 51 किलो लड्डू का भोग महंत चल्ला शास्त्री की देखरेख में लगाया गया।

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